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Friday, 1 May 2015

ये संसार सारहीन है


देखिये , दो बात पर जोर दिया जा रहा है ! ये संसार सारहीन है इसमें इतना ही सार है कि मानव शरीर पा कर हरि एवं गुरु से सच्चा प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो जाय।

.......श्री महाराज जी।

सार सारहीन है


ये संसार सारहीन है इसमें इतना ही सार है कि मानव शरीर पा कर हरि एवं गुरु से सच्चा प्रेम सम्बन्ध स्थापित हो जाय।

.......श्री महाराज जी।

Top Ten Indications of God's Grace

 
Top 10 ways for you to know that God loves you and that you are special in His eyes:
 
10. You have food to eat and a roof over your head.
9. You have clean water to drink.
8. You can enjoy the pitter patter of rain.
7. You can see the colors God has created in the sky, trees and flowers.
6. You had a reason to smile today.
5. You have been taught by wonderful teachers and mentors.
4. A child gave you a big smile.
3. You had an opportunity to choose between 'right' and 'wrong' today.
2. You live in a peaceful country.
1. You were fortunate enough to remember God today.

Thursday, 30 April 2015

Today's Darshan- Bhakti Mandir

तुम जीवन - जीवन जीवनधन


तुम जीवन - जीवन जीवनधन |
तिन जीवन जीवन बस जीवन, जिन जीवन, किय जीवन अरपन |
जिन किय निज कहँ अरपन तिन कहँ, अरपन कर निज कहँ यह तव पन |
तिन दिय भार डारि तोहिं शिशु जनु, तुम सँभार जननी जनु छन छन |
तिनके अवगुन गिनत न अगनित, अगनित करि तिन कहँ इक गुन गन |
कह ‘कृपालु’ पुनि ते जिन जन जन, तिन मानत निज जन महँ प्रिय – जन ||

भावार्थ - हे जीवनधन श्यामसुन्दर ! तुम समस्त जीवात्माओं की आत्मा हो | उन्हीं जीवों का जीवन धन्य है जिन जीवों ने अपना जीवन तुम्हें समर्पित कर दिया है | जो जीव अपने जीवन को तुम्हें समर्पित कर देते हैं उन्हें तुम भी अपने आप को समर्पित कर देते हो, यह तुम्हारा प्रण है | अपने को समर्पित किये हुये जीव नवजात शिशु की भाँति निश्चिन्त हो जाते हैं और तुम माता की तरह क्षण - क्षण में उनके योगक्षेम को वहन करते हो | उन शरणागत जीवों के अगणित अवगुणों को एक भी नहीं मानते एवं उनके एक गुण को अगणित करके मानते हो | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि फिर उन शरणागत जीवों के भी जो शरणागत हो जाते हैं उन्हें तुम अपने प्रियजनों में सर्वाधिक प्रियजन मानते हो |

( प्रेम रस मदिरा मिलन – माधुरी )
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

अगर है चाह, हो घनश्याम


अगर है चाह, हो घनश्याम की मुझपर नज़र पहले,
तो उनके आशिकों की ख़ाक-ए-पा में कर गुज़र पहले।
तरीका है अजब इस इश्क की मंज़िल में चलने का,
कदम पीछे गुज़रता है, गुज़रता है सर पहले।
उसी का घर बना पहले, दिल-ए-मोहन की बस्ती में,
कि जिसका दीन-ओ-दुनिया दोनों से उजड़ा है घर पहले।
मज़ा तब है कि कुर्बानी में हर एक ज़िद से बढ़ता हो,
ये तन पहले, ये जाँ पहले, ये दिल पहले, ज़िगर पहले।
ना घबरा गर ये तेरी आँख के ये अश्रु लुटते हैं,
यकीं रख ये कि उल्फ़त में नफ़ा पीछे, ज़रर पहले।।