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Saturday, 18 April 2015
Sunday, 12 April 2015
Saturday, 11 April 2015
सुधासिंधू श्री गुरुवर
हास परिहास में भी शास्त्रीय सिद्धांतो का निरूपण करके प्रत्येक जाति, प्रत्येक संप्रदाय, बाल,युवा,वृद्ध सभी आयु तथा शिक्षित-अशिक्षित, मुर्ख-विद्धान सभी को जिन्होंने प्रेम पाश में बांधकर विश्व बंधुत्व का क्रियात्मक रूप स्थापित किया है, ऐसे सहज सनेही सुधासिंधू श्री गुरुवर के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
समस्त शास्त्रों वेदों के गूढ़तम सिद्धांतो को भी सरल सरस रूप में प्रस्तुत करके जनसाधारण के मस्तिष्क में बैठाना, जिनके व्यक्तित्व की विलक्षणता है, ऐसे ज्ञान के अगाध समुद्र, गुरुवर को कोटि कोटि प्रणाम।
जो श्री राधाकृष्ण भक्ति के मूर्तिमान स्वरुप है, ऐसे रसिक शिरोमणि है की स्वयं तो ब्रजरस में डूबे ही रहते है साथ ही बरबस पतितो को भी यह रस प्रदान करते है. कोई अधिकारी हो या ना हो सब पर ही कृपा सिन्धु श्री कृपालु गुरुदेव कृपा की वर्षा करते है। ऐसे कृपासिंधु सदगुरुदेव के चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
शास्त्रीय सिद्धांतो को प्रवचन, साहित्य, टेलीविजन,के माध्यम से एवं प्रचारकों को शिक्षित करके देश-विदेश में भेजकर, वो अमूल्य दिव्य ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाकर, संपूर्ण विश्व का महान उपकार करने वाले करुणावतार श्री कृपालु गुरुदेव के कोमल चरणों में कोटि कोटि प्रणाम।
कृपालु
श्री गुरुदेव के अनंत गुणों में से क्या बताये,क्या लिखे कुछ समझ नहीं आता। यही कह सकते हैं- " कृपालु अनंत कृपालु कथा अनंता"......!!!
तो आइये थोड़ा कुछ और जानने समझने की असफल कोशिश करते हैं......!!!
'कृपालु'(अकारण दया,कृपा करने वाले)-यह सुमधुर नामधारी श्री कृपालु गुरुदेव ही हम सबके प्राणप्रिय गुरुदेव हैं जो रसिक शिरोमणि श्री कृष्ण के महाभाव रस में सदा स्नात रहते हैं यानि डूबे हुए रहते हैं उसी रस से। नाना प्रकार के मज़हब,धर्मों आदि के विभिन्न उपासक,साधक जो उन्हे अपना गुरु,रहबर,spiritual guide,मानकर साधना करते हैं,अपने-अपने अनुभवों के आधार पर उन्हे अलग-अलग अवतारों में देखता है।वे श्यामा-श्याम के रस-मानसरोवर में बाल-हंस की भाँति नित्य विहार करते हैं,जो रसिकों की नगरी वृन्दावन के भी न केवल रसिक प्रमुख हैं वरन जो श्यामसुंदर के उत्तुंग उफनते प्रेम-रस-ज्वार में सतत अनवरत डूबे रहते हैं,ऐसे हैं हमारे 'कृपालु सरकार'....... पापीजन जो उनकी शरण में चले जाते हैं उनके लिए वे श्री कृपालु-महाप्रभु(आवागमन रूपी संसार से) दिव्य धाम(नित्य सनातन परमानंदमय स्थान) तक पहुंचाने वाली (सुदृढ़) सीढ़ी हैं।इतना ही नहीं,सच्चे हृदय से बिलख-बिलखकर प्रायश्चित के आँसू बहाते हुए आतरनाद कर जो भी पापात्मा एक बार भी उनके चरणों में 'त्राहि माम,पाहि माम' पुकारते हुए गिर जाता है तो श्री गुरुदेव उसकी कातर पुकार सहन नहीं कर पाते,विह्वल होकर न केवल उसे गले ही लगा लेते हैं,बल्कि उसके हाथ बिक कर अपने आपको ही उसे समर्पित कर देते हैं। जितने सच्चे हम होंगे,उतने ही वो भी बल्कि उससे कई ज्यादा आपका योगक्षेम वहन करेंगे। वे सरल के लिए अत्यंत सरल,चालाक के लिए अत्यंत चालाक हैं।उनसे जीतना असंभव है।वे सिर्फ आँसुओं से,सच्ची पुकार प्रभु को पाने की जिस हृदय में उत्कंठा हो उसीसे रीझते हैं। उनको कोई जबरदस्ती रिझा नहीं सका,पैसे का अहंकार,पोस्ट का अहंकार,अन्य कई बल लिए जो उनके पास चला जाता है,उसकी और तो देखना भी पसंद नहीं करते गुरुदेव।और वो अहंकारी बेचारा उल्टे पैर वहाँ से चल देता है,अहंकार से तो सख्त परहेज है उनको। बड़े-बड़े अहंकारी लोग उनके यहाँ आए,लेकिन जिसने अपनी ज्ञान गठरिया उतार के फेंक दी,वो ही यहाँ टिका है। इनको आजतक विश्व में कोई भी चैलेंज नहीं दे सका ज्ञान में ,सब को अंदर ही अंदर पता है कौन है ये........बस उन बेचारों का अहंकार,मिथ्या ज्ञानभिमान उनको यहाँ आने नहीं देता। और आ भी जाये तो महाराजजी के यहाँ टिक ही नहीं सकता,वो लोग वास्तव में दया के पात्र हैं जो इस समय विश्व की महानतम विभूति से अपने दंभ की वजह से दूर हैं,अभी भी समय है,अहंकार त्याग दीजिये,और कृपालु महाप्रभु को सुनिए,समझिए,और उनकी शरण ग्रहण कर उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना करके अपने परम चरम लक्ष्य भगवदप्राप्ति तक पहुचने का प्रयास कीजिये।
राधे-राधे।
रामदास
समर्थ रामदास का अम्बादास नामक एक शिष्य था । उसकी भक्ति और सेवाभाव से रामदास उस पर प्रसन्न थे, किन्तु दूसरे शिष्यों को यह बात खलती थी । एक दिन मध्याह्न समय समर्थ ने उसे बुलाकर कहा, "जाओ, सामने के बिल्ववृक्ष की शाखा पर बैठकर उस शाखा को आरी से काट लाओ।" शिष्यों ने सुना, तो उन्हें यह आदेश जरा विचित्र मालूम हुआ, क्योंकि वैसा करने से अम्बादास नीचे के कुएँ में जा गिरता । उन्होंने उसे सलाह दी कि वह दूसरी शाखा पर बैठकर उस शाखा को काट लाए । किन्तु अम्बादास बोला, "मैं तो गुरुदेव की आज्ञा का पालन करूँगा।" और हुआ भी वैसा ही । ज्योंही शाखा कटने को आयी कि वह धड़ाम से कुएँ में जा गिरा । कुएँ में गिरते ही अम्बादास ने आँखें बन्द कर लीं और वह गुरुदेव का स्मरण करने लगा । थोड़ी देर बाद जब उसने आँखें खोलीं, तो उसे जल तो कहीं नहीं दिखाई दिया, बल्कि साक्षात् रघुवंश शिरोमणि श्रीरामचंद्रजी को प्रसन्न मुद्रा में सामने खड़े पाया । उनके दर्शन से वह गदगद हो गया और उसकी आँखें अश्रुविह्वल हो गयीं । भक्तिभाव से उसने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया ही था कि ऊपर से आवाज सुनाई दी, "अम्बादास कैसे हो? " बात यह थी कि अम्बादास के गिरने की आवाज सुन शिष्यगण गुरुदेव को लेकर वहाँ पहुँच गये थे और गुरुजी ने आवाज लगायी थी ।
गुरुदेव की आवाज सुनते ही अम्बादास उठने लगा, लेकिन प्रभु अंतर्धान हो गये थे । उसने वहीं से उत्तर दिया, और वह ऊपर निकल आया । गुरुदेव उससे बोले, "सचमुच तू आज्ञाकारी शिष्य है । गुरुआज्ञा पालन बस उनकी इच्छा में इच्छा यही भगवत्प्राप्ति का रहस्य है
मालिक तेरी रजा रहे, और तू ही तू रहे ।
बाकी न 'मैं' रहूँ न मेरी आरजू रहे ।।
Friday, 10 April 2015
Wednesday, 8 April 2015
Tuesday, 7 April 2015
Friday, 3 April 2015
Tuesday, 31 March 2015
Sunday, 22 March 2015
Thursday, 19 March 2015
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