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Friday, 10 April 2015

जन का मिलन


भगवान् का मिलन इतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि जन का मिलन होता है । यदि यह सोचा जाय कि जन के मिलन से वो असीम आनन्द क्यों नहीं मिला तो उसका एकमात्र कारण यही है कि हमने इसका महत्व नहीं समझा । उसकी कृपा को नहीं सोचा और यदि ऐसी स्थिति में भगवान् भी मिल जाय तो क्या लक्ष्य और परिणाम उससे मिलेगा ? अत: कृपा को बार-बार अनुभव करना ही सर्वश्रेष्ठ साधना है ।

-------- श्री महाराजजी ।
          राधे - राधे ।

Sunday, 5 April 2015

Old & Rare photograph of Shri Maharajji

Kripalu Bachnamrit


प्रश्न: सेवा को साधना से अधिक बड़ा क्यो माना गया है?उत्तर: श्री महाराजजी द्वारा: क्योकि यह जीव का स्वाभाविक स्वभाव है,जीव अनादिकाल से भगवान का दास है। जबतक भग्वत्प्राप्ति न होगी तब तक प्रत्यक्ष गुरु प्राप्त है,वह भगवतस्वरूप है। गुरु की दासता करना उसकाधर्म हैं,और भग्वद्प्राप्तिके बाद गोलोक में भी गुरु का दास रहेगा। दासत्व उसका धर्म है। जैसे अग्नि का धर्मजालना है,ऐसे ही जीव का धर्म दासत्व है।
Radhey Radhey