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Wednesday, 31 August 2016

सबसे बड़ा पूण्य


एक राजा बहुत बड़ा प्रजापालक था, हमेशा प्रजा के हित में प्रयत्नशील रहता था. वह इतना कर्मठ था कि अपना सुख, ऐशो-आराम सब छोड़कर सारा समय जन-कल्याण में ही लगा देता था . यहाँ तक कि जो मोक्ष का साधन है अर्थात भगवत-भजन, उसके लिए भी वह समय नहीं निकाल पाता था.

एक सुबह राजा वन की तरफ भ्रमण करने के लिए जा रहा था कि उसे एक देव के दर्शन हुए. राजा ने देव को प्रणाम करते हुए उनका अभिनन्दन किया और देव के हाथों में एक लम्बी-चौड़ी पुस्तक देखकर उनसे पूछा- “ महाराज, आपके हाथ में यह क्या है?”
देव बोले- “राजन! यह हमारा बहीखाता है, जिसमे सभी भजन करने वालों के नाम हैं.”
राजा ने निराशायुक्त भाव से कहा- “कृपया देखिये तो इस किताब में कहीं मेरा नाम भी है या नहीं?”
देव महाराज किताब का एक-एक पृष्ठ उलटने लगे, परन्तु राजा का नाम कहीं भी नजर नहीं आया.

राजा ने देव को चिंतित देखकर कहा- “महाराज ! आप चिंतित ना हों , आपके ढूंढने में कोई भी कमी नहीं है. वास्तव में ये मेरा दुर्भाग्य है कि मैं भजन-कीर्तन के लिए समय नहीं निकाल पाता, और इसीलिए मेरा नाम यहाँ नहीं है.”
उस दिन राजा के मन में आत्म-ग्लानि-सी उत्पन्न हुई लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे नजर-अंदाज कर दिया और पुनः परोपकार की भावना लिए दूसरों की सेवा करने में लग गए.
कुछ दिन बाद राजा फिर सुबह वन की तरफ टहलने के लिए निकले तो उन्हें वही देव महाराज के दर्शन हुए, इस बार भी उनके हाथ में एक पुस्तक थी. इस पुस्तक के रंग और आकार में बहुत भेद था, और यह पहली वाली से काफी छोटी भी थी.
राजा ने फिर उन्हें प्रणाम करते हुए पूछा- “महाराज ! आज कौन सा बहीखाता आपने हाथों में लिया हुआ है?”
देव ने कहा- “राजन! आज के बहीखाते में उन लोगों का नाम लिखा है जो ईश्वर को सबसे अधिक प्रिय हैं !”
राजा ने कहा- “कितने भाग्यशाली होंगे वे लोग ? निश्चित ही वे दिन रात भगवत-भजन में लीन रहते होंगे !! क्या इस पुस्तक में कोई मेरे राज्य का भी नागरिक है?
देव महाराज ने बहीखाता खोला, और ये क्या, पहले पन्ने पर पहला नाम राजा का ही था।
राजा ने आश्चर्य चकित होकर पूछा महाराज मेरा इसमे कैसे लिखा हुआ है,मैं तो मन्दिर भी कभी कभार ही जाता हूँ?
देव ने कहा राजन इसमे आश्चर्य की क्या बात है ? जो लोग निष्काम भाव होकर संसार की सेवा करते हैं ,जो लोग संसार के उपकार में अपना जीवन अर्पण करते हैं ,जो लोग मुक्ती का लोभ भी त्यागकर प्रभू के निर्बल सन्तानो की सेवा सहायता में अपना योगदान देते हैं उन त्यागी महापुरुषों का भजन स्वयं ईस्वर करता है ,ऐ राजन ! तू मत पछता की तू पूजा पाठ नहीं करता है , लोगों की सेवा कर तू असल में भगवान की ही पूजा करता है.
परोपकार और निःस्वार्थ लोकसेवा किसी भी उपासना और पूजन से बढ़कर है।
देव ने वेदों का उदाहरण देते हुए कहा
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छनम् समाः एवान्त्वाप नान्यतोअस्ति व कर्म लिप्यते नरे .."
अर्थात्-- कर्म करते हुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करो तो कर्म बन्धन में लिप्त हो जाओगे , राजन! भगवान दीन दयालू है .उन्हें खुसामद नही भाती बल्कि आचरण भाता है..सच्ची भक्ती तो यही है की परोपकार करो ,दीन दुखियों का हित साधन करो ,अनाथ ,विधवा,किसान व निर्धन आज अत्याचारियों से सताए जाते हैं 
इनकी यथाशक्ति सहायता और सेवा करो यही परम भक्ती है...
राजा को आज देव के माध्यम से बहुत बड़ा ज्ञान मिल चूका था और अब राजा भी समझ गया कि परोपकार से बढ़कर कुछ भी नहीं और जो परोपकार करते हैं वही भगवान के सबसे प्रिय होते हैं ।
मित्रों जो ब्यक्ति निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करने के लिए आगे आते हैं ,परमात्मा हर समय उनके कल्याण के लिए यत्न करता है. हमारे पूर्वजों ने भी कहा है- "परोपकाराय
पुण्याय भवति" अर्थात दूसरों के लिए जीना दूसरों की सेवा को ही पूजा समझ कर कर्म करना ,परोपकार के लिए अपने जीवन को सार्थक बनाना ही सबसे बड़ा पूण्य है . और जब आप भी ऐसा करेंगे तो स्वतः ही आप भी उस ईस्वर के प्रिय भक्तों में सामिल हो जायेंगे।
🙏🏻 श्री राधे राधे🙏🏻

Wednesday, 21 August 2013

हरि नाम कौ आधार


माधवजू, जो जन तैं बिगरै / सूरदास
माधवजू, जो जन तैं बिगरै।
तउ कृपाल करुनामय केसव, प्रभु नहिं जीय धर॥
जैसें जननि जठर अन्तरगत, सुत अपराध करै।
तोऊ जतन करै अरु पोषे, निकसैं अंक भरै॥
जद्यपि मलय बृच्छ जड़ काटै, कर कुठार पकरै।
तऊ सुभाव सुगंध सुशीतल, रिपु तन ताप हरै॥
धर विधंसि नल करत किरसि हल बारि बांज बिधरै।
सहि सनमुख तउ सीत उष्ण कों सोई सफल करै॥
रसना द्विज दलि दुखित होति बहु, तउ रिस कहा करै।
छमि सब लोभ जु छांड़ि छवौ रस लै समीप संचरै॥
करुना करन दयाल दयानिधि निज भय दीन डर।
इहिं कलिकाल व्याल मुख ग्रासित सूर सरन उबरे॥
भावार्थ :- जीव के प्रति भगवान की असीम करुणाशीलता है। कितना ही कोई अपराध करे, करुणामय हरि उसे क्षमा ही करते हैं। बच्चा कितने ही अपराध करे, माता तो उसे छाती से लगा कर प्यार ही करेगी। मलयागिर कुठाराघात करने वाले के शरीर को भी शीतलता देगा। धरती को हल से जोतते हैं, उसे विदीर्ण करते हैं, फिर भी वह दुःखों को झेलकर सुन्दर फल देती है। जीभ की भी यही बात है। सदा दांतों तले दबी रहती है, पर कभी दांतों पर क्रोध नहीं करती। छहों रसों का स्वाद उनको चखाती है। ऐसे ही ईश्वर अपनों के अज्ञानावस्था में किये अपराधों को क्षमा कर देता है।

शब्दार्थ :- तऊ =तो भी। नहिं जीय धरै =मन में नहीं लाते। जठर अन्तर्गत = पेट के भीतर, गर्भ में। अंक =गोद। रिपु =शत्र, काटने से तात्पर्य है। धर =धरा, पृथ्वी। नल =नाला। करषि =जोत कर। द्विज =दांत।


कीजै प्रभु अपने बिरद की लाज / सूरदास
कीजै प्रभु अपने बिरद की लाज।
महापतित कबहूं नहिं आयौ, नैकु तिहारे काज॥
माया सबल धाम धन बनिता, बांध्यौ हौं इहिं साज।
देखत सुनत सबै जानत हौं, तऊ न आयौं बाज॥
कहियत पतित बहुत तुम तारे स्रवननि सुनी आवाज।
दई न जाति खेवट उतराई, चाहत चढ्यौ जहाज॥
लीजै पार उतारि सूर कौं महाराज ब्रजराज।
नई न करन कहत, प्रभु तुम हौ सदा गरीब निवाज॥

भावार्थ :- इस पद में भक्त ने भगवान के आगे अपना हृदय खोलकर रख दिया है। कहता है तुम्हें अपने विरद की लाज रखनी हो, तो तार ही दो। पूछो, तो मैं आज तक तुम्हारे काम नहीं आया। इस प्रबल माया अकोन, कामिनी-कांचन के बंधन में बहुत बुरी तरह से जकड़ा हूं। देखता हूं, सुनता हूं और सब जानता हूं, पर जो नहीं करना चाहिए, वही करता चला जाता हूं। पर यह विश्वास है, कि तुम पतितोद्धारक हो। यद्दपि मैं पार उतराई नहीं देना चाहता हूं, फिर भी नाव पर चढ़ना चाहता हूं। तुमसे कोई नई बात करने को नहीं कहता। तुम तो सदा से पतितों को पार उतारते आये हो। तुम गरीब-निवाज हो, तो मुझ गरीब को भी पार लगा दो। `नेकु तिहारे काज,' `तऊ न आयौं बाज,' `दई न जाति....जहाज,' `नई न करन कहत' आदि की बड़ी सुन्दर और मुहावरे-दार भाषा है। अहंकार को भगवान की अगाध करुणा में डुबो देने की ओर इस पद में संकेत किया गया है।

शब्दार्थ :-बिरद =बड़ाई। न आयौं बाज = छोड़ा नहीं। खेवट = नाव खेने वाला। उतराई =पार उतारने की मजदूरी। नई = कोई नई बात।


सरन गये को को न उबार्‌यो / सूरदास
सरन गये को को न उबार्‌यो।
जब जब भीर परीं संतति पै, चक्र सुदरसन तहां संभार्‌यौ।
महाप्रसाद भयौ अंबरीष कों, दुरवासा को क्रोध निवार्‌यो॥
ग्वालिन हैत धर्‌यौ गोवर्धन, प्रगट इन्द्र कौ गर्व प्रहार्‌यौ॥
कृपा करी प्रहलाद भक्त पै, खम्भ फारि हिरनाकुस मार्‌यौ।
नरहरि रूप धर्‌यौ करुनाकर, छिनक माहिं उर नखनि बिदार्‌यौ।
ग्राह-ग्रसित गज कों जल बूड़त, नाम लेत वाकौ दुख टार्‌यौ॥
सूर स्याम बिनु और करै को, रंगभूमि में कंस पछार्‌यौ॥

भावार्थ :-जो भी भगवान की शरण में गया, उसने अभय पद पाया। यद्यपि भगवान् का न कोई मित्र है, न कोई शत्रु, तो भी सत्य और असत्य की मर्यादा की रक्षा के लिए, अजन्मा होते हुए भी वह `रक्षक' और `भक्षक' के रूप धारण करते हैं। प्रतिज्ञा भी यही है।

शब्दार्थ :- उबार्‌यौ =रक्षा की। भीर =संकट। संभार्‌यौ = हाथ में लिया। अंबरीष = एक हरि भक्त राजा। दुरवासा = दुर्वासा नामके एक महान क्रोधी ऋषि। प्रहार्‌यौ =नष्ट किया। नरहरि = नृसिंह। नखनि =नाखूनों से। बिदार्‌यौ =चीर फाड़ डाला। रंगभूमि = सभा स्थल।


जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत / सूरदास
जौलौ सत्य स्वरूप न सूझत।
तौलौ मनु मनि कंठ बिसारैं, फिरतु सकल बन बूझत॥
अपनो ही मुख मलिन मंदमति, देखत दरपन माहीं।
ता कालिमा मेटिबै कारन, पचतु पखारतु छाहिं॥
तेल तूल पावक पुट भरि धरि, बनै न दिया प्रकासत।
कहत बनाय दीप की बातैं, कैसे कैं तम नासत॥
सूरदास, जब यह मति आई, वै दिन गये अलेखे।
कह जानै दिनकर की महिमा, अंध नयन बिनु देखे॥

भावार्थ :- `सत्य स्वरूप' अपनी आत्मा का वास्तविक रूप। असत् शरीर को ही अविद्यावश `आत्मा' मान लिया गया है। वह तो सनातन सत्य है। `तौलों.....बूझत' मणि-माला गले में ही पहने है , पर भ्रमवश इधर-उधर खोजता फिरता है। आत्मा तो अन्तर में ही है, पर उसे हम जगह-जगह खोजते फिरते हैं। `अपनी...छाहिं' मुंह में तो अपना काला है, पर वह मूर्ख शीशे में कालिमा समझ रहा है , उस शीशे को बार-बार साफ कर रहा है। असद्ज्ञान के साधन भी असत् ही होते हैं। जब तक जीवात्मा को स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नहीं हुआ, उसे `सत्' `असत्' का विवेक प्राप्त नहीं हो सकता।

शब्दार्थ :- बूझत फिरतु =पूछता फिरता है। पचतु =परेशान होता है। पखारतु = धोता है, साफ करता है। तूल =रुई। पुट = दीपक से तात्पर्य है। अलख =वृथा।


तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान / सूरदास
तुम्हारी भक्ति हमारे प्रान।
छूटि गये कैसे जन जीवै, ज्यौं प्रानी बिनु प्रान॥
जैसे नाद-मगन बन सारंग, बधै बधिक तनु बान।
ज्यौं चितवै ससि ओर चकोरी, देखत हीं सुख मान॥
जैसे कमल होत परिफुल्लत, देखत प्रियतम भान।
दूरदास, प्रभु हरिगुन त्योंही सुनियत नितप्रति कान॥

भावार्थ :- यह अनन्यता का वर्णन है। यह `तन्मयता' से प्राप्त होती है। बिना प्राण के जैसे `प्राणी' शब्द निरर्थक है, वैसे ही भगवद्भक्ति-रहित जीवन व्यर्थ है। मृग का राग-प्रेम, चकोर का चन्द्र-प्रेम और कमल का सूर्य प्रेम प्रसिद्ध है। जीव को इसी प्रकार भगवत्प्रेम में तन्मय हो जाना चाहिए।

शब्दार्थ :- जन =दास। नाद =शब्द, राग। सारंग =मृग। भान= भानु,सूर्य।

धोखैं ही धोखैं डहकायौ / सूरदास
धोखैं ही धोखैं डहकायौ।
समुझी न परी विषय रस गीध्यौ, हरि हीरा घर मांझ गंवायौं॥
क्यौं कुरंग जल देखि अवनि कौ, प्यास न गई, दसौं दिसि धायौ।
जनम-जनम बहु करम किये हैं, तिन में आपुन आपु बंधायौ॥
ज्यौं सुक सैमर -फल आसा लगि निसिबासर हठि चित्त लगायौ।
रीतो पर्‌यौ जबै फल चाख्यौ, उड़ि गयो तूल, तांबरो आयौ॥
ज्यौं कपि डोरि बांधि बाजीगर कन-कन कों चौहटें नचायौ।
सूरदास, भगवंत भजन बिनु काल ब्याल पै आपु खवायौ॥

भावार्थ :- क्षणिक विषय-रसों में आनंद मानकर यह जीव आत्मानन्द से विमुख रह गया। धोखे में ठगाया गया। `हरि-हीरा' को अंतर में खोकर जीवनभर विषय-रस में भूला रहा। कालरूपी सर्प खा गया। `ज्यों सुक...आयौ.' तोता सेमर के फल में रात-दिन आशा लगाये बैठा रहा, कि कब पकता है। अंत में पका जानकर चोंच मारी तो अंदर से केवल रुई निकली। इससे किसकी भूख बुझी है? विषय-सुखों का परिणाम सारहीन ही है। अंत में, जब काल-ब्याल के मुख में पड़ गया, तब पछताने से क्या होगा ?

शब्दार्थ :- डहकायौ =ठगा गया। गीध्यौ = लालच में पड़ गया। कुरंग = मृग। जल देखि अवनि कौ = ग्रीष्म में धरती से उठती हुई गर्म हवा को जल समझ लिया, यही मृगतृष्णा है। सेमर =शाल्मलि वृक्ष। तूल =रूई। तांवरो =मूर्छा।चौंहटे =चौहटा,चौक।


कहावत ऐसे दानी दानि / सूरदास
कहावत ऐसे दानी दानि।
चारि पदारथ दिये सुदामहिं, अरु गुरु को सुत आनि॥
रावन के दस मस्तक छेद, सर हति सारंगपानि।
लंका राज बिभीषन दीनों पूरबली पहिचानि।
मित्र सुदामा कियो अचानक प्रीति पुरातन जानि।
सूरदास सों कहा निठुरई, नैननि हूं की हानि॥
भावार्थ :- `कहावत ...दानि' ऐसे दानी आज`दानी' के नाम से प्रसिद्ध हैं; राम और कृष्ण को लोग बड़ा दानी कहते हैं। पर उन्होंने कोई निःस्वार्थ दान तो दिया नहीं। अकारण दान करते, तो दानी अवश्य कहे जाते। फिर भी वे आज `दानी' के नाम से पुकारे जाते हैं। `चारि...सुदामहिं,' सुदामा और श्रीकृष्ण उज्जैन में गुरु सांदीपन के गुरुकुल में पढ़ते थे। सुदामा ने वहां कभी कृष्ण को कोई कष्ट नहीं होने दिया। यदि द्वारिकाधीश ने तब उसे माला-माल कर दिया होता, तो कौन-सी बड़ी बात थी। प्रत्युपकार ही होना था। विभीषण ने घर के सारे भेद राम को बतला दिये थे, उन्होंने उसे लंका का राज्य सौंप दिया। फिर भी राम और कृष्ण आदर्श दानी कहे जाते हैं। कुछ हो, सूर के साथ तो निठुराई का ही व्यवहार किया, नेत्रों से भी हीन कर दिया।

शब्दार्थ :- छेदे =काट डाले। सारंगपानि = धनुर्धारी राम। पूरबली = पुरानी, पहले की। निठुराई =निर्दयता, निठुराईं।

मेरो मन अनत कहां सचु पावै / सूरदास
मेरो मन अनत कहां सुख पावै।
जैसे उड़ि जहाज कौ पंछी पुनि जहाज पै आवै॥
कमलनैन कौ छांड़ि महातम और देव को ध्यावै।
परमगंग कों छांड़ि पियासो दुर्मति कूप खनावै॥
जिन मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यों करील-फल खावै।
सूरदास, प्रभु कामधेनु तजि छेरी कौन दुहावै॥

भावार्थ :- यहां भक्त की भगवान् के प्रति अनन्यता की ऊंची अवस्था दिखाई गई है। जीवात्मा परमात्मा की अंश-स्वरूपा है। उसका विश्रान्ति-स्थल परमात्माही है , अन्यत्र उसे सच्ची सुख-शान्ति मिलने की नहीं। प्रभु को छोड़कर जो इधर-उधर सुख खोजता है, वह मूढ़ है। कमल-रसास्वादी भ्रमर भला करील का कड़वा फल चखेगा ?कामधेनु छोड़कर बकरी को कौन मूर्ख दुहेगा ?

शब्दार्थ :- अनत =अन्यत्र। सचु =सुख, शान्ति। कमलनैन = श्रीकृष्ण। दुर्मति= मूर्ख खनावै = खोदता है। करील -फल = टेंट। छेरी =बकरी।


प्रभु, मेरे औगुन चित न धरौ / सूरदास
है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥
नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥
दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार॥
भावार्थ :- `हरि-भजन' ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट और तत्काल फलदायक साधन है। इसलिए `सब तज, हरि भज' ही मुख्य है।
शब्दार्थ :- आधार = भरोसा। बिधि =वेदोक्त कर्म-कांड से आशय है। ब्यौहार =क्रिया, साधन। सुक =शुकदेव। इतौई =इतना ही। गुन =गुण-सत्व, रज और तमोगुण। जार =जाल। भवभार =जन्म मरण के चक्र से अभिप्राय है।


है हरि नाम कौ आधार / सूरदास
है हरि नाम कौ आधार।
और इहिं कलिकाल नाहिंन रह्यौ बिधि-ब्यौहार॥
नारदादि सुकादि संकर कियौ यहै विचार।
सकल स्रुति दधि मथत पायौ इतौई घृत-सार॥
दसहुं दिसि गुन कर्म रोक्यौ मीन कों ज्यों जार।
सूर, हरि कौ भजन करतहिं गयौ मिटि भव-भार॥

भावार्थ :- `हरि-भजन' ही मुक्ति का सर्वोत्कृष्ट और तत्काल फलदायक साधन है। इसलिए `सब तज, हरि भज' ही मुख्य है।

शब्दार्थ :- आधार = भरोसा। बिधि =वेदोक्त कर्म-कांड से आशय है। ब्यौहार =क्रिया, साधन। सुक =शुकदेव। इतौई =इतना ही। गुन =गुण-सत्व, रज और तमोगुण। जार =जाल। भवभार =जन्म मरण के चक्र से अभिप्राय है।

Tuesday, 20 August 2013

सूरदास पद



चरन कमल बंदौ हरि राई / सूरदास
चरन कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, आंधर कों सब कछु दरसाई॥
बहिरो सुनै, मूक पुनि बोलै, रंक चले सिर छत्र धराई।
सूरदास स्वामी करुनामय, बार-बार बंदौं तेहि पाई॥

भावार्थ :-- जिस पर श्रीहरि की कृपा हो जाती है, उसके लिए असंभव भी संभव हो जाता है। लूला-लंगड़ा मनुष्य पर्वत को भी लांघ जाता है। अंधे को गुप्त और प्रकट सबकुछ देखने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। बहरा सुनने लगता है। गूंगा बोलने लगता है कंगाल राज-छत्र धारण कर लेता हे। ऐसे करूणामय प्रभु की पद-वन्दना कौन अभागा न करेगा।
शब्दार्थ :-राई= राजा। पंगु = लंगड़ा। लघै =लांघ जाता है, पार कर जाता है। मूक =गूंगा। रंक =निर्धन, गरीब, कंगाल। छत्र धराई = राज-छत्र धारण करके। तेहि = तिनके। पाई =चरण।


अबिगत गति कछु कहति न आवै / सूरदास
अबिगत गति कछु कहति न आवै।
ज्यों गूंगो मीठे फल की रस अन्तर्गत ही भावै॥
परम स्वादु सबहीं जु निरन्तर अमित तोष उपजावै।
मन बानी कों अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
रूप रैख गुन जाति जुगति बिनु निरालंब मन चकृत धावै।
सब बिधि अगम बिचारहिं, तातों सूर सगुन लीला पद गावै॥
भावार्थ :- यहां अव्यक्तोपासना को देहाभिमानियों के लिए क्लिष्ट बताया है। निराकार निर्गुण ब्रह्म का चिंतन अनिर्वचनीय है। वह मन और वाणी का विषय नहीं। गूंगे को मिठाई खिला दी जाय और उससे उसका स्वाद पूछा जाय, तो वह कैसे बतला सकता है, वह रसानंद तो उसका अन्तर ही जानता है। अव्यक्त ब्रह्म का न रूप है, न रेख, न गुण है, न जाति। मन वहां स्थिर ही नहीं हो सकता। सब प्रकार से वह अगम्य है, अतः सूरदास सगुण ब्रह्म श्रीकृष्ण की लीलाओं का ही गायन करना ठीक समझते हैं।

शब्दार्थ :- अबिगत = अव्यक्त, अज्ञेय जो जाना न जा सके। गति = बात। अन्तर्गत = हृदय, अन्तरात्मा। भावै = रुचिकर प्रतीत होता है। अमित =अपार। तोष =सन्तोष, आनन्द। अगोचर = इन्द्रियजन्य ज्ञान से परे। गुन =गुण, सत्व, रज और तमो गुण से आशय है। निरालंब = बिना अवलंब या सहारे के। सगुन =सगुण, दिव्यगुण संयुक्त साकार ब्रह्म श्रीकृष्ण।


प्रभु, मेरे औगुन न विचारौ / सूरदास
प्रभु, मेरे औगुन न विचारौ।
धरि जिय लाज सरन आये की रबि-सुत-त्रास निबारौ॥
जो गिरिपति मसि धोरि उदधि में लै सुरतरू निज हाथ।
ममकृत दोष लिखे बसुधा भरि तऊ नहीं मिति नाथ॥
कपटी कुटिल कुचालि कुदरसन, अपराधी, मतिहीन।
तुमहिं समान और नहिं दूजो जाहिं भजौं ह्वै दीन॥
जोग जग्य जप तप नहिं कीण्हौं, बेद बिमल नहिं भाख्यौं।
अति रस लुब्ध स्वान जूठनि ज्यों अनतै ही मन राख्यौ॥
जिहिं जिहिं जोनि फिरौं संकट बस, तिहिं तिहिं यहै कमायो।
काम क्रोध मद लोभ ग्रसित है विषै परम विष खायो॥
अखिल अनंत दयालु दयानिधि अघमोचन सुखरासि।
भजन प्रताप नाहिंने जान्यौं, बंध्यौ काल की फांसि॥
तुम सर्वग्य सबै बिधि समरथ, असरन सरन मुरारि।
मोह समुद्र सूर बूड़त है, लीजै भुजा पसारि॥
भावार्थ :- जीव के अपराधों का अन्त नहीं। अपराधों की तरफ देखकर यदि न्याय किया गया, तब तो उद्धार पाने की कोई आशा नहीं। `शरणागत' को भगवान तार देते हैं, इस न्याय पर ही सूर का उद्धार भवसागर से होना चाहिए।

शब्दार्थ ;- औगुन =अवगुण, दोष। सरन आए की = शरण में आने की। रविसुत = सूर्य पुत्र यमराज। त्रास = भय। निवारो =दूर कर दो। मसि =स्याही। सुरतरु =कल्पवृक्ष, यहां कल्पवृक्ष का लेखनी से आशय है। मिति =अन्त। परम बिष =तेज जहर। अखिल =सर्वरूप। अघमोचन = पापों से छुड़ानेवाला। मोह = अज्ञान, संसार से तात्पर्य है। पसारि = बढ़ाकर।

प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा / सूरदास
प्रभु, हौं सब पतितन कौ राजा।
परनिंदा मुख पूरि रह्यौ जग, यह निसान नित बाजा॥
तृस्ना देसरु सुभट मनोरथ, इंद्रिय खड्ग हमारे।
मंत्री काम कुमत दैबे कों, क्रोध रहत प्रतिहारे॥
गज अहंकार चढ्यौ दिगविजयी, लोभ छ्त्र धरि सीस॥
फौज असत संगति की मेरी, ऐसो हौं मैं ईस।
मोह मदै बंदी गुन गावत , मागध दोष अपार॥
सूर, पाप कौ गढ दृढ़ कीने, मुहकम लाय किंवार॥
भावार्थ :- यहां बड़े पापी की राजा से तुलना की गई है। परनिन्दा ही राजमहल के द्वार पर नौबत का बजना है। तृष्णा पतितेश का देश है। अनेक मनोरथ योद्धा हैं। इन्द्रियां तलवार का काम देती हैं।काम कुमंत्री है और क्रोध है द्वारपाल। अहंकार दिग्विजय कराने में साथी है। सिर पर लोभ का राज छत्र है। दुष्टों की संगति सेना है। ऐसे नरेश की विरुदावली का गान मोह मदादि कर रहे हैं। भक्तिवाद में दीनता ही दीनबंधु की शरण में ले जाती है।
शब्दार्थ :- पूरि रह्यौ =भर रहा है। निसान = नगाड़ा। रु =अरु और। सुभट =योद्धा। कुमंत = कुमंत्र, बुरी सलाह। प्रतिहार = द्वारपाल। असत =झूठ,दुष्ट ईस =राजा। मदै = मद ही। मागध =मगध देश के भाट, जो वंश विरुदावली बखानते हैं। गढ़ =किला। मुहकम = मजबूत। किंवार = किवाड़, फाटक।

अब कै माधव, मोहिं उधारि / सूरदास
अब कै माधव, मोहिं उधारि।
मगन हौं भव अम्बुनिधि में, कृपासिन्धु मुरारि॥
नीर अति गंभीर माया, लोभ लहरि तरंग।
लियें जात अगाध जल में गहे ग्राह अनंग॥
मीन इन्द्रिय अतिहि काटति, मोट अघ सिर भार।
पग न इत उत धरन पावत, उरझि मोह सिबार॥
काम क्रोध समेत तृष्ना, पवन अति झकझोर।
नाहिं चितवत देत तियसुत नाम-नौका ओर॥
थक्यौ बीच बेहाल बिह्वल, सुनहु करुनामूल।
स्याम, भुज गहि काढ़ि डारहु, सूर ब्रज के कूल॥
भावार्थ :- संसार-सागर में माया अगाध जल है , लोभ की लहरें हैं, काम वासना का मगर है, इन्द्रियां मछलियां हैं और इस जीवन के सिर पर पापों की गठरी रखी हुई है।इस समुद्र में मोह सवार है। काम-क्रोधादि की वायु झकझोर रही है। तब एक हरि नाम की नौका ही पार लगा सकती है, पर-स्त्री तथा पुत्र का माया-मोह उधर देखने ही नहीं देता। भगवान ही हाथ पकड़कर पार लगा सकते हैं।
शब्दार्थ :- अब कैं =अबकी बार ,इस जन्म में। उधारि = उद्धार करो। मगन =मग्न, डूबा हुआ। भव = संसार। अंबुनिधि =समुद्र। ग्राह =मगर। अनंग = काम वासना। मोट =गठरी। सिवार = शैवाल, पानी के अन्दर उगनेवाली घास जिसमें मनुष्य प्रायः फंस जाता है। कूल =किनारा।

मोहिं प्रभु, तुमसों होड़ परी / सूरदास
मोहिं प्रभु, तुमसों होड़ परी।
ना जानौं करिहौ जु कहा तुम, नागर नवल हरी॥
पतित समूहनि उद्धरिबै कों तुम अब जक पकरी।
मैं तो राजिवनैननि दुरि गयो पाप पहार दरी॥
एक अधार साधु संगति कौ, रचि पचि के संचरी।
भई न सोचि सोचि जिय राखी, अपनी धरनि धरी॥
मेरी मुकति बिचारत हौ प्रभु, पूंछत पहर घरी।
स्रम तैं तुम्हें पसीना ऐहैं, कत यह जकनि करी॥
सूरदास बिनती कहा बिनवै, दोषहिं देह भरी।
अपनो बिरद संभारहुगै तब, यामें सब निनुरी॥
भावार्थ :- `तुम सों होड़ परी' तुम्हारा नाम `पतितोद्धारक' है, पर मुझे इसका विश्वास नहीं। आज जांचने आया हूं, कि तुम कहां तक पतितों का उद्धार करते हो। तुमने उद्धार करने का हठ पकड़ रखा है, तो मैंने पाप करने का सत्याग्रह ठान रखा है। इस बाजी में देखना है कौन जीतता है। `मैं तो राजिव....दरी' तुम्हारे कमलदल जैसे नेत्रों की दृष्टि बचाकर मैं पाप-पहाड़ की गुफा में छिपकर बैठ गया हूं।
शब्दार्थ :- होड़ = बाजी। नागर = चतुर। जक =हठ। दरी =कन्दरा,गुफा। दुर गयो = छिप गया। अपनी धरनी = अपनी शक्ति भर। जकनि करी =हठ किया। निनुरी = निर्णय हो जाएगा।

अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल / सूरदास
अब हों नाच्यौ बहुत गोपाल।
काम क्रोध कौ पहिरि चोलना, कंठ विषय की माल॥
महामोह के नूपुर बाजत, निन्दा सब्द रसाल।
भरम भर्‌यौ मन भयौ पखावज, चलत कुसंगति चाल॥
तृसना नाद करति घट अन्तर, नानाविध दै ताल।
माया कौ कटि फैंटा बांध्यो, लोभ तिलक दियो भाल॥
कोटिक कला काछि दिखराई, जल थल सुधि नहिं काल।
सूरदास की सबै अविद्या, दूरि करौ नंदलाल॥
भावार्थ :- संसार के प्रवृति मार्ग पर भटकते-भटकते जीव अन्त में प्रभु से कहता है, तुम्हारी आज्ञा से बहुत नाच मैंने नाच लिया। अब इस प्रवृति से मुझे छुटकारा दे दो, मेरा सारा अज्ञान दूर कर दो। वह नृत्य कैसा? काम-क्रोध के वस्त्र पहने। विषय की माला पहनी। अज्ञान के घुंघरू बजे। परनिन्दा का मधुर गान गाया। भ्रमभरे मन ने मृदंग का काम दिया। तृष्णा ने स्वर भरा और ताल तद्रुप दिये। माया का फेंटा कस लिया था। माथे पर लोभ का तिलक लगा लिया था। तुम्हें रिझाने के लिए न जाने कितने स्वांग रचे। कहां-कहां नाचना पड़ा, किस-किस योनि में चक्कर लगाना पड़ा। न तो स्थान का स्मरण है, न समय का। किसी तरह अब तो रीझ जाओ, नंदनंदन।

शब्दार्थ :- चोलना = नाचने के समय का घेरदार पहनावा। पखावज =मृदंग। विषय = कुवासना। फैंटा =कमरबंद। अविद्या =अज्ञान।

कब तुम मोसो पतित उधारो / सूरदास
कब तुम मोसो पतित उधारो।
पतितनि में विख्यात पतित हौं पावन नाम तिहारो॥
बड़े पतित पासंगहु नाहीं, अजमिल कौन बिचारो।
भाजै नरक नाम सुनि मेरो, जमनि दियो हठि तारो॥
छुद्र पतित तुम तारि रमापति, जिय जु करौ जनि गारो।
सूर, पतित कों ठौर कहूं नहिं, है हरि नाम सहारो॥

भावार्थ :- जो पुण्य करता है, वह स्वर्ग पद पाता है। मैंने कोई पुण्य नहीं किया, इससे स्वर्ग जाने का तो मेरा अधिकार है नहीं। अब रह गया नरक। मगर नरक भी मेरे महान पापों को देखकर डर गया है। वहां भी प्रवेश नहीं। अब कहां जाऊं। अब तो, नाथ, तुम्हारे चरणों का ही अवलम्ब है, सो वहीं थोड़ी-सी जगह कृपाकर दे दो।
शब्दार्थ :- मोसो =मेरे समान। पावन =पवित्र करने वाला। पासंगहुं =पासंग भी। अजमिल = भक्त अजामिल, जो लड़के का `नारायण' नाम लेने से यम पाश से मुक्त हो गया था। बिचारो = बेचारा। भाजै =भागता है। जमनि =यमदूतों ने। हठी =जबरदस्ती से। तारो =ताला। गारो =बड़ाई, अभिमान। ठौर जगह।

अपन जान मैं बहुत करी / सूरदास
आछो गात अकारथ गार्‌यो।
करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्‌यो॥
निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार्‌यो।
अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन दई कौ मार्‌यो॥
कामी कृपन कुचील कुदरसन, को न कृपा करि तार्‌यो।
तातें कहत दयालु देव पुनि, काहै सूर बिसार्‌यो॥
भावार्थ :- `जनम....हार्‌यो' = प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया। नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को `मोक्ष का द्वार' कहा है, उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी, कृपण, मलिन और कुरूपों को भव-सागर से तार दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने, उस दयालु ने सूर को क्यों बिसरा दिया !

शब्दार्थ :- आछो = अच्छा, सुन्दर। गात =शरीर। अकारथ = व्यर्थ। गार्‌यो =बरबाद कर दिया। ज्यो =जीव। तुअ =तेरी। चार्‌यो = चारों नेत्र, दो बाहर के नेत्र और दो भीतर के ज्ञान नेत्र। दई =दुर्दैव, दुर्भाग्य। कृपन =लोभी, घृणित। कुचील =मैला, गंदा। कुदरसन = कुरूप।

आछो गात अकारथ गार्‌यो / सूरदास
आछो गात अकारथ गार्‌यो।
करी न प्रीति कमललोचन सों, जनम जनम ज्यों हार्‌यो॥
निसदिन विषय बिलासिन बिलसत फूटि गईं तुअ चार्‌यो।
अब लाग्यो पछितान पाय दुख दीन दई कौ मार्‌यो॥
कामी कृपन कुचील कुदरसन, को न कृपा करि तार्‌यो।
तातें कहत दयालु देव पुनि, काहै सूर बिसार्‌यो॥
भाव :- `जनम....हार्‌यो' = प्रत्येक जन्म में व्यर्थ ही सुन्दर शरीर नष्ट कर दिया। नर शरीर पाकर भी हरि का भजन करते न बना। जिस शरीर को `मोक्ष का द्वार' कहा है, उसे भी विषय-भोगों में नष्ट कर दिया। पर भक्त को प्रभु की कृपा का अब भी भरोसा है। हरि की कृपा ने बड़े-बड़े कामी, कृपण, मलिन और कुरूपों को भव-सागर से तार दिया। लेकिन सूर को तो इस नियम में भी अपवाद प्रतीत होता है। न जाने, उस दयालु ने सूर को क्यों बिसरा दिया !

शब्दार्थ :- आछो = अच्छा, सुन्दर। गात =शरीर। अकारथ = व्यर्थ। गार्‌यो =बरबाद कर दिया। ज्यो =जीव। तुअ =तेरी। चार्‌यो = चारों नेत्र, दो बाहर के नेत्र और दो भीतर के ज्ञान नेत्र। दई =दुर्दैव, दुर्भाग्य। कृपन =लोभी, घृणित। कुचील =मैला, गंदा। कुदरसन = कुरूप।

सोइ रसना जो हरिगुन गावै / सूरदास
सोइ रसना जो हरिगुन गावै।
नैननि की छवि यहै चतुरता जो मुकुंद मकरंदहिं धावै॥
निर्मल चित तौ सोई सांचो कृष्ण बिना जिहिं और न भावै।
स्रवननि की जु यहै अधिकाई, सुनि हरि कथा सुधारस प्यावै॥
कर तैई जै स्यामहिं सेवैं, चरननि चलि बृन्दावन जावै।
सूरदास, जै यै बलि ताको, जो हरिजू सों प्रीति बढ़ावै॥
भावार्थ :- `हरि-परायण' होने में ही हरेक इंद्रिय की सार्थकता है, यही इस पद का सार है `नैननि की.....धावे' = नेत्रों को अप्रकट रूप से यहां भ्रमर बनाया गया है। उसी नैन रूपी मधुकर के सफल जीवन हैं, जो मुकुंदरूपी मकरंद अर्थात कृष्ण-छवि पराग का पान करने के लिए दौड़ते हैं।

शब्दार्थ :- रसना =जीभ, वाणी। छवि =शोभा। मकरंद =पराग। न भावै = अच्छा नहीं लगता है। अधिकाई = बड़ाई, सार्थकता।

Saturday, 10 December 2011

Endless hands of my lord



Time is endless in thy hands, my lord. There is none to count thy minutes.
Days and nights pass and ages bloom and fade like flowers. Thou knowest how to wait.
Thy centuries follow each other perfecting a small wild flower.
We have no time to lose, and having no time we must scramble for a chances. We are too poor to be late.
And thus it is that time goes by while I give it to every querulous man who claims it, and thine altar is empty of all offerings to the last.
At the end of the day I hasten in fear lest thy gate to be shut; but I find that yet there is time.

Coolness



I am like a remnant of a cloud of autumn uselessly roaming in the sky, O my sun ever-glorious! Thy touch has not yet melted my vapour, making me one with thy light, and thus I count months and years separated from thee.
If this be thy wish and if this be thy play, then take this fleeting emptiness of mine, paint it with colours, gild it with gold, float it on the wanton wind and spread it in varied wonders.
And again when it shall be thy wish to end this play at night, I shall melt and vanish away in the dark, or it may be in a smile of the white morning, in a coolness of purity transparent.

My wakeful hours



If it is not my portion to meet thee in this life then let me ever feel that I have missed thy sight---let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.
As my days pass in the crowded market of this world and my hands grow full with the daily profits, let me ever feel that I have gained nothing---let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.
When I sit by the roadside, tired and panting, when I spread my bed low in the dust, let me ever feel that the long journey is still before me---let me not forget a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.
When my rooms have been decked out and the flutes sound and the laughter there is loud, let me ever feel that I have not invited thee to my house---let me not forget for a moment, let me carry the pangs of this sorrow in my dreams and in my wakeful hours.

Sunday, 4 December 2011

Fearful Joy



Is it beyond thee to be glad with the gladness of this rhythm? to be tossed and lost and broken in the whirl of this fearful joy?
All things rush on, they stop not, they look not behind, no power can hold them back, they rush on.
Keeping steps with that restless, rapid music, seasons come dancing and pass away---colours, tunes, and perfumes pour in endless cascades in the abounding joy that scatters and gives up and dies every moment.